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मेरे महबूब न जा
आज की रात न जा
होने वाली है सहर
थोड़ी देर और ठहर
देख कितना हसीन मौसम है
हर तरफ एक अजीब आलम है
जर्रे इस तरहा आज निखरे हैं
जैसे तारे जमीं पे बिखरे हैं
जैसे तारे जमीं पे बिखरे हैं
मेरे महबूब न जा
आज की रात न जा
मैंने काटे हैं इन्तजार के दिन
तब कहीं आए हैं बहार के दिन
यूँ न जा दिल की शम्मा गुल कर के
अब भी देखा नहीं है दिल भर के
अब भी देखा नहीं है दिल भर के
मेरे महबूब न जा
आज की रात न जा
जब से जुल्फोँ की छाँव पायी है
बेकरारी को भी नींद आई है
इस कयामत को यूँहि जाने दे
रात ढ़लने दे सुबहा होने दे
रात ढ़लने दे सुबहा होने दे
मेरे महबूब न जा
आज की रात न जा
इस तरहा फेर कर नज़र मुझसे
दूर जायेगा तू अगर मुझसे
चाँदनी से भी आग बरसेगी
शम्मा भी रोशनी को तरसेगी
शम्मा भी रोशनी को तरसेगी
मेरे महबूब न जा
आज की रात न जा
मेरे महबूब न जा
आज की रात न जा
(फिल्म: नूर महल)
(गायिका: सुमन कल्यानपुर)
(गीत: सबा अफगानी)
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